Friday, 30 March 2012

नवरात्रि-रामनवमी

नमामि नारायणपादपङ्कजम् स्तोत्रम्
नमामि नारायणपादपङ्कजं करोमि नारायणपूजनं सदा I
वदामि नारायणनाम निर्मलं स्मरामि नारायणतत्वमव्ययम् II १ II
श्रीनाथ नारायण वासुदेव श्रीकृष्ण भक्तप्रिय चक्रपाणे I
श्रीपद्मनाभाच्युत कैटभारे श्रीराम पद्माक्ष हरे मुरारे II २ II
अनन्त वैकुण्ठ मुकुन्द कृष्ण गोविन्द दामोदर माधवेति I
वक्तुं समर्थोSपि न वक्ति कश्र्चिदहो जनानां व्यसनाभिमुख्यम् II ३ II
ध्यायन्ति ये विष्णुमनन्तमव्ययं हृत्पद्ममध्ये सततं व्यवस्थितम् I
समाहितानां सतताभयप्रदं ते यान्ति सिद्धिं परमां च वैष्णवीम् II ४ II
क्षीरसागरतरन्गशीकरासारतार चितचारुमूर्तये I
भोगिभोगशयनीयशायिने माधवाय मधुविद्विषे नमः II ५ II
II इति श्री नमामिनारायणपादपङ्कजं स्तोत्रम् संपूर्णं II


नवरात्रि कथा

नवरात्रि एक हिंदू पर्व है। नवरात्रि संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है नौ रातें । यह पर्व साल में चार बार आता है।चैत्र,आषाढ,अश्विन,पोषप्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातो में तीन देवियों - महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वतीया सरस्वतीकि तथा दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हे नवदुर्गा कहते हैं
श्री शैलपुत्री,श्री ब्रह्मचारिणी,श्री चंद्रघंटा,श्री कुष्मांडा,श्री स्कंदमाता,श्री कात्यायनी,श्री कालरात्रि,श्री महागौरी,श्री सिद्धिदात्री
शक्ति की उपासना का पर्व शारदेय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है।

पूजन विधि

चौमासे में जो कार्य स्थगित किए गए होते हैं, उनके आरंभ के लिए साधन इसी दिन से जुटाए जाते हैं। क्षत्रियों का यह बहुत बड़ा पर्व है। इस दिन ब्राह्मण सरस्वती-पूजन तथा क्षत्रिय शस्त्र-पूजन आरंभ करते हैं। विजयादशमी या दशहरा एक राष्ट्रीय पर्व है। अर्थात आश्विन शुक्ल दशमी को सायंकाल तारा उदय होने के समय 'विजयकाल' रहता है। यह सभी कार्यों को सिद्ध करता है। आश्विन शुक्ल दशमी पूर्वविद्धा निषिद्ध, परविद्धा शुद्ध और श्रवण नक्षत्रयुक्त सूर्योदयव्यापिनी सर्वश्रेष्ठ होती है। अपराह्न काल, श्रवण नक्षत्र तथा दशमी का प्रारंभ विजय यात्रा का मुहूर्त माना गया है। दुर्गा-विसर्जन, अपराजिता पूजन, विजय-प्रयाग, शमी पूजन तथा नवरात्र-पारण इस पर्व के महान कर्म हैं। इस दिन संध्या के समय नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है। क्षत्रिय/राजपूतों इस दिन प्रातः स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त होकर संकल्प मंत्र लेते हैं। इसके पश्चात देवताओं, गुरुजन, अस्त्र-शस्त्र, अश्व आदि के यथाविधि पूजन की परंपरा है

राम नवमी

चैत्र शुक्ल नवमी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र, कर्क लग्न में जब सूर्य अन्यान्य पाँच ग्रहों की शुभ दृष्टिके साथ मेष राशि पर विराजमान थे, तभी साक्षात् भगवान् श्री राम का माता कौशल्या के गर्भ से जन्म हुआ।दिन के बारह बजे जैसे ही सौंदर्य निकेतन, शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए हुए चतुर्भुजधारी श्रीराम प्रकट हुए तो मानो माता कौशल्या उन्हें देखकर विस्मित हो गईं। उनके सौंदर्य व तेज को देखकर उनके नेत्र तृप्त नहीं हो रहे थे । श्रीराम के जन्मोत्सव को देखकर देवलोक भी अवध के सामने फीका लग रहा था। देवता, ऋषि, किन्नार, चारण सभी जन्मोत्सव में शामिल होकर आनंद उठा रहे थे।आज भी हम प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल नवमी को राम जन्मोत्सव मनाते हैं और राममय होकर कीर्तन, भजन, कथा आदि में रम जाते हैं । रामजन्म के कारण ही चैत्र शुक्ल नवमी को रामनवमी कहा जाता है। रामनवमी के दिन ही गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना का श्रीगणेश किया था । उस दिन जो कोई व्यक्ति दिनभर उपवास और रातभर जागरण का व्रत रखकर भगवान् श्रीराम की पूजा करता है, तथा अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार दान-पुण्य करता है, वह अनेक जन्मों के पापों को भस्म करने में समर्थ होता है।


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