एक बार नारद जी जा रहे
थे, रास्ते में सर्प देवता ने कहा कि आप संत है, अगले जन्म में कुछ कर्म
किया इसलिए मैं सर्प योनी को प्राप्त हुआ, अब इस योनी से छूटने का उपाय
बताये..? नारद जी बोले ..’द्वेष न कर, किसी को काटना नहीं’… वर्ष भर के बाद
नारद जी उसी रास्ते से गुजर रहे थे… तो देखा की सर्प देवता की दुर्दशा थी.…
सर्प के दांत टूट गए..शरीर में जखम.. सर्प की ये दुर्दशा देख कर नारद जी ने पूछा ये दशा कैसे हुई ? सर्प बोला आपने
धर्म उपदेश दिया, उस को निभा रहा हूँ !…नारद जी चौकन्ने होकर बोले…किन्तु जो धर्म की
रक्षा करता, धर्म उसकी रक्षा करता है..पर तुम्हारी तो ये दुर्दशा हुई है, मतलब तुमसे
कही न कही जरूर कोई गलती हुई है..नारद जी ने सर्प राज से पूछा कि, तुमने क्या
किया ?..सर्पराज बोले, आप ने कहा कि किसी को काटना नहीं, तो मैंने किसी को नहीं
काटा …परन्तु परिणाम कोई तो मेरी पूछ को हिलाए..कोई मुझे इधर-उधर फेंके…कोई मुझे रस्सी
की तरह खेले…तब से मेरी ये दुर्दशा हो गयी.. नारद जी बोले कि, मैंने किसी
को काटना,किसी से द्वेष नहीं करने के लिए बोला था ….लेकिन आत्म रक्षा के
लिए मना नहीं किया था...यही भूल तुम्हारी दुर्दशा का कारण है !
आतंकवाद
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किसने लूटी है ये वसुंधरआ
किसने हरियाली में रक्त भरा
गोलियाँ चलती हैं बमों के धमाकें हैं
इंसां मरते हैं जैसे जलते पटाखे हैं
कौन ले गया है अमन और चैन जहाँ से
चारों दिशा में गूँजता यह किसका नाद है
यह आतंकवाद है यह आतंकवाद है
किसने हरियाली में रक्त भरा
गोलियाँ चलती हैं बमों के धमाकें हैं
इंसां मरते हैं जैसे जलते पटाखे हैं
कौन ले गया है अमन और चैन जहाँ से
चारों दिशा में गूँजता यह किसका नाद है
यह आतंकवाद है यह आतंकवाद है


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