Monday, 4 July 2011

धरा पर आने से पहले ही है सहमी बेटी...

ओंस की बूंद सी होती है बेटियाँ ,
जरा भी दर्द हो तो रोती है बेटियाँ,

रौशन करेगा बेटा तो बस एक ही कुल को,
दो दो कुल की लाज ढोती है बेटियाँ,
कोई नहीं एक दुसरे से कम,
हीरा अगर है बेटा ,तो सच्ची मोती है बेटियाँ,
कांटो की राह पर ये खुद ही चलती रहेंगी,
ओरों के लिए फूल सी होती है बेटियाँ,

विधि का विधान है यही दुनिया की रस्म है,
मुट्ठी भर नीर सी होती है बेटियाँ!

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तूं अपने सर पे अदावत का आसमान न ले।

जो लोग चुप हैं कभी उनका इम्तिहान न ले।

जमीन कांप उठेगी लबों के हिलने से,

मैं एक फकीर हूं मुझसे मेरी जुबान न ले।

धरा पर आने से पहले ही है सहमी बेटी,

कि मेरी जान कहीं मेरा बागवान न ले।

छिनाल शब्द का उपयोग कर रहा कुलपति,

गजल डरी है कहीं लूट मेहरबान न ले।

जहां के लोग फसादात को मजहब समझें,

वहां पे मुफ्त भी मिलता है तो मकान न ले।

कहा अदब से कि रस्ता गलत है दहशत का,

जवाब आया हथेली पर अपनी जान न ले।

इश्क में मैंने ही मुमताज कहा है उसको,

अब डरा हूं वो मुझे शाहजहां जान न ले।

हिंदसागर व हिंदकुश की ऋचाओं में अमन

चाह रखता है तो यूरोप का सामान न ले।

मेरी रगों में इन्कलाब की रवायत है,

मेरे अजीज मुझे वक्त गया मान न ले।
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा |
इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जाएगा ||

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है|
जिस तरफ भी चल पडेंगे रास्ता हो जाएगा||

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