ओस की एक बूँद सी होती है बेटियां ,
स्पर्श खुरदरा हो तो, रोती है बेटियां ,
रोशन करेगा बेटा तो एक ही कुल को ,
दो-दो कुलों की लाज को रखती है बेटियां ,
कोई नहीं है कम एक-दूसरे से दोस्तों ,
हीरा अगर है बेटा,तो मोती है बेटियां ,
काँटों की राह पे,ये खुद ही चलती रहती ,
औरों के लिए फूल ही चुनती है बेटियां ,
बेटा बुढ़ापे की लाठी तो.....
बूढ़ी आँखों की ज्योति है बेटियां !!
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देश में
पुरुषों के मुकाबले स्त्रियों की कम होती संख्या चिंता का विषय है। यह
चिंता होना भी चाहिये क्योंकि जब हम मानव समाज की बात करते हैं तो वह दोनों
पर समान रूप से आधारित है। रिश्तों के नाम कुछ भी हों मगर स्त्री और पुरुष
के बीच सामजंस्य के चलते ही परिवार चलता है और उसी से देश को आधार मिलता
है। इस समय स्त्रियों की कमी का कारण ‘कन्या भ्रुण हत्या’ को माना जा रहा
है जिसमें उसके जनक माता, पिता, दादा, दादी, नाना और नानी की सहमति शामिल
होती है। यह संभव नहीं है कि कन्या भ्रूण हत्या में किसी नारी की सहमति न
शामिल हो। संभव है कि नारीवादी कुछ लेखक इस पर आपत्ति करें पर यह सच नहीं
बदल सकता क्योंकि हम अपने समाज की कुरीतियों, अंधविश्वासों और पाखंडों को
अनदेखा नहीं कर सकते जिसमें स्त्री और पुरुष समान रूप से शामिल होते दिखते
हैं।
हो सकता है कि कुछ लोग हमारी बुद्धि पर ही संशय करें, पर इतना तय है कि जब
देश के बुद्धिजीवी किसी समस्या को लेकर चीखते हैं तब उसे हम समस्या नहीं
बल्कि समस्याओं या सामाजिक विकारों का परिणाम मानते हैं। टीवी और समाचार
पत्रों के समाचारों में लड़कियों के विरुद्ध अपराधों की बाढ़ आ गयी है और कुछ
बुद्धिमान लोग इसे समस्या मानकर इसे रोकने के लिये सरकार की नाकामी मानकर
हो हल्ला मचाते हैं। उन लोगों से हमारी बहस की गुंजायश यूं भी कम जाती हैं
क्योंकि हम तो इसे कन्या भ्रुण हत्या के फैशन के चलते समाज में लिंग
असंतुलन की समस्या से उपजा परिणाम मानते है। लड़की की एकतरफ प्यार में
हत्या हो या बलात्कार कर उसे तबाह करने की घटना, समाज में लड़कियों की
खतरनाक होती जा रही स्थिति को दर्शाती हैं।
इस देश में गर्भ में कन्या की हत्या करने का फैशन करीब बीस साल पुराना हो
गया है। यह सिलसिला तब प्रारंभ हुआ जब देश के गर्भ में भ्रुण की पहचान कर
सकने वाली ‘अल्ट्रासाउंड मशीन’ का चिकित्सकीय उपयोग प्रारंभ हुआ। दरअसल
पश्चिम के वैज्ञानिकों ने इसका अविष्कार गर्भ में पल रहे बच्चे तथा अन्य
लोगों पेट के दोषों की पहचान कर उसका इलाज करने की नीयत से किया था। भारत
के भी निजी चिकित्सकालयों में भी यही उद्देश्य कहते हुए इस मशीन की स्थापना
की गयी। यह बुरा नहीं था पर जिस तरह इसका दुरुपयोग गर्भ में बच्चे का लिंग
परीक्षण कराकर कन्या भ्रुण हत्या का फैशन प्रारंभ हुआ उसने समाज की स्थिति
को बहुत बिगाड़ दिया। फैशन शब्द से शायद कुछ लोगों को आपत्ति हो पर सच यह
है कि हम अपने धर्म और संस्कृति में माता, पिता तथा संतानों के मधुर
रिश्तों की बात भले ही करें पर कहीं न कहीं भौतिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं
की वजह से उनमें जो कृत्रिमता है उसे भी देखा जाना चाहिए। अनेक ज्ञानी लोग
तो अपने समाज के बारे में साफ कहते हैं कि लोग अपने बच्चों को हथियार की
तरह उपयोग करना चाहते हैं जैसे कि स्वयं अपने माता पिता के हाथों हुए।
मतलब दैहिक रिश्तों में धर्म या संस्कृति का तत्व देखना अपने आपको धोखा
देना है। जिन लोगों को इसमें आपत्ति हो वह पहले कन्या भ्रुण हत्या के लिये
तर्कसंगत विचार प्रस्तुत करते हुए उस उचित ठहरायें वरना यह स्वीकार करें
कि कहीं न कहीं अपने समाज के लेकर हम आत्ममुग्धता की स्थिति में जी रहे
हैं।
जब कन्या भ्रुण हत्या का फैशन की शुरुआत हुई तब समाज के विशेषज्ञों ने
चेताया था कि अंततः यह नारी के प्रति अपराध बढ़ाने वाला साबित होगा क्योंकि
समाज में लड़कियों की संख्या कम हो जायेगी तो उनके दावेदार लड़कों की संख्या
अधिक होगी नतीजे में न केवल लड़कियों के प्रति बल्कि लड़कों में आपसी विवाद
में हिंसा होगी। इस चेतावनी की अनदेखी की गयी। दरअसल हमारे देश में
व्याप्त दहेज प्रथा की वजह से लोग परेशान रहे हैं। कुछ आम लोग तो बड़े
आशावादी ढंग से कह रहे थे कि ‘लड़कियों की संख्या कम होगी तो दहेज प्रथा
स्वतः समाप्त हो जायेगी।’
कुछ लोगों के यहां पहले लड़की हुई तो वह यह सोचकर बेफिक्र हो गये कि कोई बात
नहीं तब तक कन्या भ्रुण हत्या की वजह से दहेज प्रथा कम हो जायेगी। अलबत्ता
वही दूसरे गर्भ में परीक्षण के दौरान लड़की होने का पता चलता तो उसे नष्ट
करा देते थे। कथित सभ्य तथा मध्यम वर्गीय समाज में कितनी कन्या भ्रुण
हत्यायें हुईं इसकी कोई जानकारी नहीं दे सकता। सब दंपतियों के बारे में तो
यह बात नहीं कहा जाना चाहिए पर जिनको पहली संतान के रूप में लड़की है और
दूसरी के रूप में लड़का और दोनों के जन्म के बीच अंतर अधिक है तो समझ लीजिये
कि कहीं न कहंी कन्या भ्रुण हत्या हुई है-ऐसा एक सामाजिक विशेषज्ञ ने अपने
लेख में लिखा था। अब तो कई लड़किया जवान भी हो गयी होंगी जो पहली संतान के
रूप में उस दौर में जन्मी थी जब कन्या भ्रुण हत्या के चलते दहेज प्रथा कम
होने की आशा की जा रही थी। मतलब यह कि यह पच्चीस से तीस साल पूर्व का
सिलसिला है और दहेज प्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही। हम दहेज प्रथा
समाप्ति की आशा भी कुछ इस तरह कर रहे थे कि शादी का संस्कार बाज़ार के नियम
पर आधारित है यानि धर्म और संस्कार की बात एक दिखावे के लिये करते हैं।
इसका कारण यह है कि देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। मध्यम वर्ग के
लोग अब निम्न मध्यम वर्ग में और निम्न मध्यम वर्ग के गरीब वर्ग में आ गये
हैं पर सच कोई स्वीकार नहीं कर रहा। लड़कियों के लिये वर ढूंढना इसलिये भी
कठिन है क्योंकि रोजगार के आकर्षक स्तर में कमी आई है। अपनी बेटी के लिये
आकर्षक जीवन की तलाश करते पिता को अब भी भारी दहेज प्रथा में कोई राहत नहीं
है। उल्टे शराब, अश्लील नृत्य तथा विवाहों में बिना मतलब के व्यय ने
लड़कियों की शादी कराना एक मुसीबत बना दिया है। इसलिये योग्य वर और वधु का
मेल कराना मुश्किल हो रहा है।
फिर पहले किसी क्षेत्र में लड़कियां अधिक होती थी तो दीवाने लड़के एक नहीं
तो दूसरी को देखकर दिल बहला लेते थे। दूसरी नहीं तो तीसरी भी चल जाती। अब
स्थिति यह है कि एक लड़की है तो दूसरी दिखती नहीं, सो मनचले और दीवाने लड़कों
की नज़र उस पर लगी रहती है और कभी न कभी सब्र का बांध टूट जाता है और
पुरुषत्व का अहंकार उनको हिंसक बना देता है। लड़कियों के प्रति बढ़ते अपराध
कानून व्यवस्था या सरकार की नाकामी मानना एक सुविधाजनक स्थिति है और समाज
के अपराध को दरकिनार करना एक गंभीर बहस से बचने का सरल उपाय भी है।
हम जब स्त्री को अपने परिवार के पुरुष सदस्य से संरक्षित होकर राह पर चलने
की बात करते हैं तो नारीवादी बुद्धिमान लोग उखड़ जाते हैं। उनको लगता है कि
अकेली घूमना नारी का जन्मसिद्ध अधिकार है और राज्य व्यवस्था उसको हर कदम
पर सुरक्षा दे तो यह एक काल्पनिक स्वर्ग की स्थिति है। यह नारीवादी
बुद्धिमान नारियों पर हमले होने पर रो सकते हैं पर समाज का सच वह नहीं
देखना चाहते। हकीकत यह है कि समाज अब नारियों के मामले में मध्ययुगीन
स्थिति में पहुंच रहा है। हम भी चुप नहीं बैठ सकते क्योंकि जब नारियों के
प्रति अपराध होता है तो मन द्रवित हो उठता है और लगता है कि समाज अपना
अस्तित्व खोने को आतुर है।
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