Friday, 19 August 2011

गाँवों का रोना दिल्ली को गाना लगता है

गज़ल

चिड़िया की जाँ लेने में इक दाना लगता है
पालन कर के देखो एक जमाना लगता है ॥

अंधों की सरकार बनी तो उनका राजा भी

आँखों वाला होकर सबको काना लगता है ॥

जय-जय के नारों ने अब तक कर्म किये ऐसे

हर जयकारा अब ईश्वर पर ताना लगता है ॥

कुछ भी पूछो, इक सा बतलाते सब नाम-पता

तेरा कूचा मुझको पागलखाना लगता है ॥

दूर बजें जो ढोल सभी को लगते हैं अच्छे

गाँवों का रोना, दिल्ली को गाना लगता है ॥

कल तक झोपड़ियों के दीप बुझाने का मुजरिम

सत्ता पाने पर, अब वो परवाना लगता है ॥

टूटेंगें विश्वास, कली से मत पूछो कैसा

यौवन देवों को देकर मुरझाना लगता है ॥

जाँच समितियों से करवाकर कुछ ना पाओगे

उसके घर में शाम-सबेरे थाना लगता है॥

***
भूखे इंसान के पास देश भक्ति कहां से आयेगी,
रोटी की तलाश में भावना कब तक जिंदा रह पायेगी।
पत्थर और लोहे से भरे शहर भले देश दिखलाते रहो
महंगाई वह राक्षसी है जो देशभक्ति को कुचल जायेगी।

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