Thursday, 16 June 2011

आख़िरी अध्याय की आख़िरी बात...

न बाबा कम और न सरकार
 घूंघट में सन्यासी : भारत के इतिहास में पहली बार,बाबा राम देव जी का अनोखा "योग"-दान 
योग गुरू बाबा रामदेव जी के साथ जो कुछ अभद्रता की गई वह निंदनीय है लेकिन यह भी सच है कि आदमी विपत्तिकाल में ही पहचाना जाता है। संकट में ही आदमी की वीरता और उसके नेतृत्व की परख होती है। यह देखकर बहुत दुख हुआ कि ज़रा सी मुसीबत पड़ते ही ‘भारत स्वाभिमान ट्रस्ट‘ के संस्थापक औरतों के आंचल तले जा दुबके जो कि न तो एक वीर गृहस्थ को शोभा देता है और न ही एक सन्यासी को। बाबा रामदेव एक आर्य समाजी सन्यासी हैं।
आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद जी ने की थी। उन्होंने आजीवन हिन्दू मत के भ्रष्ट मठाधीशों से जमकर मुक़ाबला किया लेकिन न कभी कहीं से भागे और न ही कभी छिपे। इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि उनकी जान को अमुक से ख़तरा है क्योंकि उन्हें पता था कि जो काम वे लेकर चल रहे हैं। उसमें जान जानी ही जानी है।
मैं उनके बहुत से विचारों से सहमत नहीं हूं तो भी उनके जीवट की प्रशंसा ज़रूर ही करूंगा।

ऐसे ही उनके जीवन की एक घटना और भी याद आती है। एक बार वे नदी किनारे ध्यान लगाए बैठे थे तभी एक औरत आई और उसने उनके पैर छू लिए। स्वामी जी ने तुरंत आंखें खोलीं और नदी में छलांग लगा दी। उन्हें यह गवारा नहीं था कि कोई औरत उन्हें छुए क्योंकि एक सन्यासी की मर्यादा यही है। स्वामी जी ने एक सन्यासी की मर्यादा का ध्यान रखा और जीवन के कठिन कष्टों को हंसकर झेला जबकि अच्छे अच्छे भाग खड़े होते हैं। बाबा रामदेव जी पर मुसीबत पड़ी तो वे अपने गुरू जी के पदचिन्हों पर भी न टिक सके और मामूली सी झड़प को अपने जीवन की सबसे काली रात घोषित कर दिया। ऐसी ऐसी रातें तो स्वामी दयानंद जी के जीवन में बहुत गुज़री हैं।
बाबा रामदेव जी को स्वामी दयानंद जी के जीवन से कुछ सबक़ हासिल करना चाहिए और जब तक उनमें नेतृत्व के गुण अच्छी तरह विकसित न हो जाएं तब तक उन्हें योग सिखाना चाहिए और कराटे-कुंगफ़ू सीखना चाहिए ताकि मुसीबत के मौक़ों पर अपनी जान बचाने के लिए आगे उन्हें औरतों के आंचल तले न छिपना पड़े। यह एक सन्यासी की मर्यादा के प्रतिकूल है। ऐसा दृश्य शायद इस महान भूमि पर पहली बार देखा गया है। यह वाक़ई एक शोकपूर्ण घटना है जिसमें कांग्रेस और बाबा दोनों ही फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी के ज़िम्मेदार हैं। 

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