Tuesday, 2 August 2011

रिश्ते बड़े नाज़ुक, बड़े चंचल, बड़े रंगीले होते हैं…

रिश्ते बड़े नाज़ुक, बड़े चंचल, बड़े रंगीले होते हैं,
आज हैं साथ, तो कल हम अकेले होते हैं, बड़ी ही बेपाकी से बढ़ाते हैं, हाथ निभाने के लिए,
एक पल की रोशनी, तो कल हम अँधेरे में होते हैं,
कभी एक दोस्त, एक साथी और एक हमसफर बनकर,
ना जाने कौन सा रंग हैं, हम हर रंग को ढोते हैं,
नही कुछ भी सिवा धोखा और तकलीफ़ के इसमें,
कल अकेले में हँसते थे, आज संग होकर भी रोते हैं,
नही समझाई क्यू हमको, किसी ने रिश्तों की दौलत,
कभी लुटाते थे हम सब पर, आज पाकर भी खोते हैं,
हैं एक शीशा दिखाने को, ज़माने के  दिखावे में,
कभी अक्श हंस दिया हम पे, कभी हम अक्श पर रोते हैं,
बदलते हर लम्हा रिश्ते, कितने रिश्तों को खोते हैं,
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मेरा  खामोश  रह  कर  भी  उन्हें  सब  कुछ  सुना  देना  
ज़बां  से  कुछ  न  कहना  देख  कर  आंसू  बहा  देना  

नशेमन  हो  न  हो  ये  तो  फलक  का  मशगला  ठहरा  
के  दो  तिनके  जहां  पर  देखना  बिजली  गिरा  देना  

इजाज़त  हो  तो  कह  दूँ किस्सा -ए-उल्फत  सर -ए-महफ़िल  
मुझे  कुछ  तो   फ़साना  याद  है  कुछ  तुम  सुना   देना 


मैं  मुजरिम  हूँ  मुझे  इक़रार  है  जुर्म -ए -मुहब्बत  का  
मगर  पहले  खता  पर  गौर  कर  लो  फिर  सज़ा  देना

मैं  इस  हालत  में  पहुंचा  हश्रवाले  खुद  पुकार  उठे
कोई  फ़रियाद  करने  आ   रहा  है  रास्ता  देना 

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