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बलात्कार एक ऐसा भयावह अपराध है जिसकी शिकार हुई पीड़िता ही उस दर्द को बेहतर जानती है. समाज के भेड़ियों की नजरें अपने उस शिकार पर इस तरह आ गड़ती हैं कि ताउम्र पीड़िता को वही चेहरा याद आता है और उसकी जिंदगी पल-पल मौत में तब्दील हो जाती है. लेकिन समाज की बेरुखी देखिए कि वह बलात्कारी के खिलाफ कठोर होने की बजाय शिकार हुई पीड़िता को ही दोषी ठहराने लगता है.
बहुत दुखदायी बना दी जाती है उस स्त्री की जिंदगी जो किसी की हवस का शिकार बनी हो. ना सिर्फ समाज बल्कि घर वाले भी उसकी ओर उदासीन रवैय्या अपना लेते हैं. छोटी-छोटी बच्चियां भी कुत्सित वृत्ति वाले दरिंदों की जब-तब शिकार बनती रहती हैं, यहॉ तक कि अकसर परिचित और रिश्तेदार भी नादान बच्चियों से अपनी वासना शांत करते हैं और लोकलाज के कारण ऐसे मामले घर में ही दबा दिए जाते हैं.
बलात्कारियों के खिलाफ कठोर सजा की पैरवी करते हुए दिल्ली की एक सत्र अदालत की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश कामिनी लॉ ने बधियाकरण (नपुंसक बनाना) को समय की जरूरत बताते हुए बलात्कारियों के लिए शल्य चिकित्सा या रासायनिक प्रक्रिया से बधियाकरण यानि नपुंसक बनाने का प्रावधान जोड़ने की सिफारिश की है.
न्यायालय के अनुसार, देश के कानून बनाने वाले विद्वानों को अभी भी यह बात संज्ञान में लेना बाकी है कि बलात्कार की वैकल्पिक सजा के तौर पर सर्जिकल या रासायनिक बधियाकरण जैसी सजा दी जाए. विशेष रूप से मासूम बच्चियों, नाबालिग के दुष्कर्मियों को ऐसी सजा देने के बारे में गंभीरता से विचार होना चाहिए.


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