Tuesday, 3 May 2011

* चित्रकूट दर्शन *




चित्रकूट में स्वागत है
-: भूमिका :-
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मंदाकिनी नदी के किनारे पर बसा चित्रकूट धाम भारत के सबसे प्राचीन तीर्थस्थलों में एक है। उत्तर-प्रदेश में 38.2 वर्ग किमी. के क्षेत्र में फैला शांत और सुन्दर चित्रकूट प्रकृति और ईश्वर की अनुपम देन है। चारों ओर से विन्ध्य पर्वत श्रृंखलाओं और वनों से घिरे चित्रकूट को अनेक आश्चर्यो की पहाड़ी कहा जाता है। मंदाकिनी नदी के किनार बने अनेक घाट और मंदिर में पूरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है।
माना जाता है कि भगवान राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ अपने वनवास के चौदह वर्षो में ग्यारह वर्ष चित्रकूट में ही बिताए थे। इसी स्थान पर ऋषि अत्री और सती अनसुइया ने ध्यान लगाया था। ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने चित्रकूट में ही सती अनसुइया के घर जन्म लिया था।
तुलसीदास जी को हनुमान जी के दर्शन प्राप्त थे| हनुमान जी से ही प्रेरणा प्राप्त करके तुलसीदास जी ने "रामचरितमानस" की| तुलसीदास जी को हनुमान जी के दर्शन कैसे मिले यह भी एक रोचक कथा है| कहा जाता है कि प्रतिदिन प्रातःकाल जब शौच के लिये गंगापार जाते थे तो वापसी के समय लोटे में बचे हुये पानी को एक पेड़ के जड़ में डाल दिया करते थे| उस पेड़ में एक प्रेत का निवास था| रोज पानी मिलने की वजह से उसे संतुष्टि मिली वह तुलसीदास जी पर प्रसन्न हो गया और उनके सामने प्रकट होकर उसने वर मांगने के लिया कहा| तुलसीदास जी ने भगवान श्रीरामचंद्र के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की| इस पर प्रेत ने कहा कि मैं भगवान श्रीरामचंद्र के दर्शन तो नहीं करवा सकता पर इतना अवश्य बता सकता हूँ कि फलाने मंदिर में नित्य सायंकाल में भगवान श्रीरामचंद्र की कथा होती है और वहाँ कथा सुनने के लिये हनुमान जी कोढ़ी के वेश में आते हैं| कथा सुनने के लिये सबसे पहले वे ही आते हैं और सबके चले जाने के बाद अंत में ही वे जाते हैं| वे ही आपको भगवान श्रीरामचंद्र के दर्शन करा सकते हैं अतः वहाँ जाकर उन्हीं से प्रार्थना कीजिये| तुलसीदास जी ने वहाँ जाकर अवसर पाते ही हनुमान जी के पैर पकड़ लिये और उन्हें प्रसन्न कर लिया| हनुमान जी ने कहा कि चित्रकूट चले जाओ वहीं तुम्हे भगवान श्रीरामचंद्र के दर्शन होंगे| तुलसीदास जी चित्रकूट पहुँच गये| वहाँ के जंगल गुजरते हुये उन्होंने दो राजकुमारों को, जिनमें से एक श्यामवर्ण के थे और दूसरे गौरवर्ण के, एक हिरण का पीछा करते हुये देखा| राजकुमारों के आँखों से ओझल हो जाने पर हनुमान जी ने प्रकट होकर बताया कि वे दोनों राजकुमार ही राम और लक्ष्मण थे| तुलसीदास जी को बहुत पछतावा हुआ कि वे उन्हें पहचान नहीं पाये| हनुमान जी ने कहा कि पछतावो मत एल बार फिर तुम्हे भगवान श्रीरामचंद्र के दर्शन होंगे तब मैं इशारे से तुम्हे बता दूंगा| संवत् 1607 के मौनी अमावश्या के दिन तुलसीदास जी चित्रकूट के घाट पर चंदन घिस रहे थे| तभी बालक के रूप में भगवान श्रीरामचंद्र वहाँ पर आये और तुलसीदास जी से मांगकर उन्हीं को चंदन लगाने लगे इसी समय हनुमान जी एक ब्राह्मण के रूप में आकर इस प्रकार गाने लगेः
चित्रकूट के घाट पर, भइ संतन की भीर |
तुलसीदास चंदन घिसै, तिलक देत रघुबीर ॥
इस पर तुलसीदास जी ने श्री रामचंद्र जी को पहचान लिया और उनके चरण पकड़ लिये|
नित्य भगवान श्रीरामचंद्र की भक्ति में लीन रहने से सहज ही उनकी अलौकिक शक्तियाँ जागृत हो गई थीं और उनके मुख से निकले शब्द सच सिद्ध हो जाते थे| एक महिला जो कि तुरंत ही विधवा हुई थी ने तुलसीदास जी को प्रणाम किया| अनजाने में ही उनके मुख से आशीर्वाद के रूप में 'सौभाग्यवती भव' शब्द निकल गये तो महिला का पति जीवित हो उठा| यह बात बादशाह तक पहुँच गई| बादशाह ने तुलसीदास को बुलवाकर करामात दिखाने के लिये कहा| तुलसीदास जी ने जवाब दिया कि मैं "रामनाम" के सिवाय और कोई करामात नहीँ जानता| इस पर बादशाह ने उन्हें कैद कर लेने का हुक्म दे दिया| कैद में तुलसीदास जी ने हनुमान जी की स्तुति करना आरंभ कर दिया| चमत्कारिक रूप से अनगिनत बंदर आ गये और किले में उत्पात मचाने लगे| बादशाह ने तुलसीदास जी से क्षमायाचना करके उन्हें कैद से आजाद कर दिया तो सारे बंदर वापस चले गये|
निःसंदेह तुलसीदास जी अलौकिक व्यक्तित्व के स्वामी थे| "रामचरिमानस" की रचना करके समस्त हिंदुओं पर एक बहुत बड़ा उपकार किया है| "रामचरितमानस" ग्रंथ संसार के लिये एक अमूल्य उपहार है| अंत में एक बात और| तुलसीदास जी का जन्म श्रावण शुक्ल सप्तमी को हुआ था और 126 वर्ष पश्चात पवित्र गंगा नदी के असी घाट पर श्रावण शुक्ल सप्तमी को ही उनकी मृत्यु हुई| इस पर किसी कवि ने कहा हैः
संवत् सोलह सौ असी, असी गंग के तीर |
श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर || 
केवट प्रसंग ---
भगवान राम के मर्म को
केवट कैसे जानता था ?
रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में संत श्री तुलसीदास जी ने लिखा है -
मांगी नाव न केवट आना।
कहहि तुम्हार मरमु मैं जाना॥
अब प्रश्न यह उठता है कि जन्म जन्मांतर तक तपस्या करने के बाद भी जिनके मर्म को बड़े बड़े ऋषि मुनि नहीं जान पाते उन्हीं श्री राम के सामने ही केवट कह रहा है कि मैं तुम्हारे मर्म को जानता हूँ।
बड़ी विचित्र बात लगती है यह। पर विद्वान तुलसीदास जी भी मिथ्या बात नहीं लिख सकते। संत तुलसीदास जी को पूर्ण विश्वास था कि केवट न केवल भगवान विष्णु के अवतार श्री रामचन्द्र के मर्म को जानता था वरन् अपनी इस उपलब्धि के विषय में गर्व पूर्वक स्वयं प्रभु श्रीराम के सामने कहने का साहस भी रखता था तभी उन्होंने ऐसा लिखा। आइये हम भी जानने का प्रयास करें कि आखिर केवट प्रभु श्री रामचन्द्र जी के मर्म को कैसे जानता था।
वो चित्र तो आपने देखा ही होगा जिसमें क्षीरसागर में भगवान विष्णु शेष शैया पर विश्राम कर रहे हैं और लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रही हैं। जरूर देखा होगा। हाँ तो बात ये हुई कि विष्णु जी के एक पैर का अंगूठा शैया के बाहर आ गया और लहरें उससे खिलवाड़ करने लगीं। क्षीरसागर के एक कछुये ने इस दृश्य को देखा और मन में यह विचार कर कि मैं यदि भगवान विष्णु के अंगूठे को अपनी जिव्ह्या से स्पर्श कर लूँ तो मेरा मोक्ष हो जायेगा उनकी ओर बढ़ा। उसे भगवान विष्णु की ओर आते हुये शेषनाग जी ने देख लिया और कछुये को भगाने के लिये जोर से फुँफकारा। फुँफकार सुन कर कछुवा भाग कर छुप गया। कुछ समय पश्चात् जब शेष जी का ध्यान हट गया तो उसने पुनः प्रयास किया। इस बार लक्ष्मी देवी की दृष्टि उस पर पड़ गई और उन्होंने उसे भगा दिया। इस प्रकार उस कछुवे ने अनेकों प्रयास किये पर शेष जी और लक्ष्मी माता के कारण उसे कभी सफलता नहीं मिली।
यहाँ तक कि श्रृष्टि की रचना हो गई और सत्युग बीत जाने के बाद त्रेता युग आ गया। इस मध्य उस कछुवे ने अनेक बार अनेक योनियों जन्म लिया और प्रत्येक जन्म में भगवान की प्राप्ति का प्रयत्न करता रहा। अपने तपोबल से उसने दिव्य दृष्टि प्राप्त कर लिया था। उसे पता था कि त्रेता युग में वही क्षीरसागर में शयन करने वाले विष्णु राम का, वही शेष जी लक्ष्मण का और वही लक्ष्मी देवी सीता के रूप में अवतरित होंगे तथा वनवास के समय उन्हें गंगा पार उतरने की आवश्यकता पड़गी। इसीलिये वह भी केवट बन कर वहाँ आ गया था।
एक युग से भी अधिक काल तक तपस्या करने के कारण उसने प्रभु के सारे मर्म जान लिये थे इसीलिये उसने राम से कहा था कि मैं आपका मर्म जानता हूँ। संत श्री तुलसीदास जी भी इस तथ्य को जानते थे इसलिये अपनी चौपाई में केवट के मुख से कहलवाया है कि "कहहि तुम्हार मरमु मैं जाना"।
केवल इतना ही नहीं, इस बार केवट इस अवसर को किसी भी प्रकार हाथ से जाने नहीं देना चाहता था। उसे याद था कि शेषनाग क्रोध कर के फुँफकारते थे और मैं डर जाता था। अबकी बार वे लक्ष्मण के रूप में मुझ पर अपना बाण भी चला सकते हैं पर इस बार उसने अपने भय को त्याग दिया था, लक्ष्मण के तीर से मर जाना उसे स्वीकार था पर इस अवसर को खो देना नहीं। इसीलिये विद्वान संत श्री तुलसीदास जी ने लिखा है -
पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उरराई चहौं ।
मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं ॥
बरु तीर मारहु लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं ।
तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं ॥
(हे नाथ! मैं चरणकमल धोकर आप लोगों को नाव पर चढ़ा लूँगा; मैं आपसे उतराई भी नहीं चाहता। हे राम! मुझे आपकी दुहाई और दशरथ जी की सौगंध है, मैं आपसे बिल्कुल सच कह रहा हूँ। भले ही लक्ष्मण जी मुझे तीर मार दें, पर जब तक मैं आपके पैरों को पखार नहीं लूँगा, तब तक हे तुलसीदास के नाथ! हे कृपालु! मैं पार नहीं उतारूँगा।)
तुलसीदास जी आगे और लिखते हैं -
सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे।
बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन॥
केवट के प्रेम से लपेटे हुये अटपटे वचन को सुन कर करुणा के धाम श्री रामचन्द्र जी जानकी जी और लक्ष्मण जी की ओर देख कर हँसे। जैसे वे उनसे पूछ रहे हैं कहो अब क्या करूँ, उस समय तो केवल अँगूठे को स्पर्श करना चाहता था और तुम लोग इसे भगा देते थे पर अब तो यह दोनों पैर माँग रहा है।
केवट बहुत चतुर था। उसने अपने साथ ही साथ अपने परिवार और पितरों को भी मोक्ष प्रदान करवा दिया। तुलसीदास जी लिखते हैं -
पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार ।
पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार ॥
चरणों को धोकर पूरे परिवार सहित उस चरणामृत का पान करके उसी जल से पितरों का तर्पण करके अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनन्दपूर्वक प्रभु श्री रामचन्द्र को गंगा के पार ले गया।
  प्रमुख आकर्षण:
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कामदगिरी
इस पवित्र पर्वत का काफी धार्मिक महत्व है। श्रद्धालु कामदगिरी पर्वत की 5 किमी. की परिक्रमा कर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण होने की कामना करते हैं। जंगलों से घिरे इस पर्वत के तल पर अनेक मंदिर बने हुए हैं। चित्रकूट के लोकप्रिय कामतानाथ और भरत मिलाप मंदिर भी यहीं स्थित है।
चित्रकूट में रामघाट
रामघाट मंदाकिनी नदी के तट पर बने रामघाट में अनेक धार्मिक क्रियाकलाप चलते रहते हैं। घाट में गेरूआ वस्त्र धारण किए साधु-सन्तों को भजन और कीर्तन करते देख बहुत अच्छा महसूस होता है। शाम को होने वाली यहां की आरती मन को काफी सुकून पहुंचाती है।
जानकी कुण्ड
रामघाट से 2 किमी. की दूरी पर मंदाकिनी नदी के किनार जानकी कुण्ड स्थित है। जनक पुत्री होने के कारण सीता को जानकी कहा जाता था। माना जाता है कि जानकी यहां स्नान करती थीं। जानकी कुण्ड के समीप ही राम जानकी रघुवीर मंदिर और संकट मोचन मंदिर है।
स्फटिक शिला
जानकी कुण्ड से कुछ दूरी पर मंदाकिनी नदी के किनार ही यह शिला स्थित है। माना जाता है कि इस शिला पर सीता के पैरों के निशान मुद्रित हैं। कहा जाता है कि जब वह इस शिला पर खड़ी थीं तो जयंत ने काक रूप धारण कर उन्हें चोंच मारी थी। इस शिला पर राम और सीता बैठकर चित्रकूट की सुन्दरता निहारते थे।
अनसुइया अत्री आश्रम - मंदाकिनी तीरे अनुसूया आश्रम
स्फटिक शिला से लगभग 4 किमी. की दूरी पर घने वनों से घिरा यह एकान्त आश्रम स्थित है। इस आश्रम में अत्री मुनी, अनुसुइया, दत्तात्रेयय और दुर्वाशा मुनी की प्रतिमा स्थापित हैं।
गुप्त गोदावरी
नगर से 18 किमी. की दूरी पर गुप्त गोदावरी स्थित हैं। यहां दो गुफाएं हैं। एक गुफा चौड़ी और ऊंची है। प्रवेश द्वार संकरा होने के कारण इसमें आसानी से नहीं घुसा जा सकता। गुफा के अंत में एक छोटा तालाब है जिसे गोदावरी नदी कहा जाता है। दूसरी गुफा लंबी और संकरी है जिससे हमेशा पानी बहता रहता है। कहा जाता है कि इस गुफा के अंत में राम और लक्ष्मण ने दरबार लगाया था।
हनुमान धारा
पहाड़ी के शिखर पर स्थित हनुमान धारा में हनुमान की एक विशाल मूर्ति है। मूर्ति के सामने तालाब में झरने से पानी गिरता है। कहा जाता है कि यह धारा श्रीराम ने लंका दहन से आए हनुमान के आराम के लिए बनवाई थी। पहाड़ी के शिखर पर ही सीता रसोई है। यहां से चित्रकूट का सुन्दर नजारा देखा जा सकता है।
भरतकूप
कहा जाता है कि भगवान राम के राज्याभिषेक के लिए भरत ने भारत की सभी नदियों से जल एकत्रित कर यहां रखा था। अत्री मुनि के परामर्श पर भरत ने जल एक कूप में रख दिया था। इसी कूप को भरत कूप के नाम से जाना जाता है। भगवान राम को समर्पित यहां एक मंदिर भी है।
आवागमन
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वायु मार्ग
चित्रकूट का नजदीकी एयरपोर्ट खजुराहो है। खजुराहो चित्रकूट से 185 किमी. दूर है।
रेल मार्ग
चित्रकूट से 8 किमी. की दूरी कर्वी निकटतम रेलवे स्टेशन है। इलाहाबाद, जबलपुर, दिल्ली, झांसी, हावड़ा, आगरा, मथुरा आदि शहरों से यहां के लिए रेलगाड़ियां चलती हैं।
सड़क मार्ग
चित्रकूट के लिए इलाहाबाद, बांदा, झांसी, महोबा, कानपुर, छतरपुर, सतना, फैजाबाद, लखनऊ, मैहर आदि शहरों से नियमित बस सेवाएं हैं।
ठहरने के स्थान
चित्रकूट में ठहरने के लिए उत्तर-प्रदेश,मध्य-प्रदेश टूरिस्ट बंगला,यात्रिका-भवन, प्रमोद वन लाज, कामदगिरि भवन, विनोद लाज, आदि में यात्रा के दौरान ठहरा जा सकता है।

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